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क्यूँ मान लूँ मैं। लोकेश शर्मा।

क्यूँ मान लूँ मैं। हमारे दरमियाँ कभी , कि कुछ था ही नही , हमने एक दूसरे को , कि कभी चाहा ही नही। तुम भी वाक़िफ़ हो , मैं भी वाक़िफ़ हूँ , ये रिश्ता सच है जिसे , कि तू अब मानता ही नही। प्यार तो था और है भी , मुझे तुमसे , तुम्हें मुझसे। तो क्यूँ झूठ बोलूँ मैं , कि  हम  अब कुछ भी नही। जो तुम्हें पसंद नही , वो बात करेंगें   भी नही। पर झुठला दूँ प्यार को , ऐसा तो हम करेंगें ही नही। टूट कर चाहा हैं हमने , दोनो ही बिखरने लगे है। तो क्यूँ मान लूँ मैं , कि हम अब साथ ही नही। तुम चाहे कह दो हमे , कि तुम अब कुछ भी नही। तो क्यूँ मान लूँ मैं , कि जो कहा वो झूठ ही नही। ~ लोकेश शर्मा।

न फिर कभी। लोकेश शर्मा।

हाँ मेरी कुछ बाते है ऐसी, जो शायद तुम्हे अच्छी न लगे। पर आज न कह सका, तो न कह सकूँगा फिर कभी। तुम जा तो रही हो छोड़कर, रोकूंगा नही तुम्हें अब। पर वादा है मेरा तुमसे, अब न मिलूंगा तुम्हें फिर कभी। चाहे दुख में ही दिन गुजरे, या फिर रो कर कटे रात। न होगा तुम्हारा इंतज़ार, न करूँगा अभिनंदन फिर कभी। जब कभी अकेला लगेगा, तब याद जरूर आएगी। पर साथ देने तुम्हारे, अब न आऊँगा मैं फिर कभी। ~लोकेश शर्मा।

बारिश आई है, भीग जाने दे। लोकेश शर्मा।

बारिश आई है ,  भीग जाने दे। आज खुद को तू भीग जाने दे। भाग भाग के सारे दिन काटे है , जाग जाग कर रोज़ राते काटी , हर वक़्त दिमाग के घोड़े भागे है , पीछे कहीं रह न जाऊं मैं बाकी , इस बारिश में इन्हें रुक जाने दे , कुछ खुद को तू आराम पाने दे। बारिश आई है , भीग जाने दे। आज खुद को तू भीग जाने दे। सब मे तू पर सब से दूर यहाँ , बहुत कुछ दिल मे छिपाता है , बाहर मुस्कुराता तेरा चेहरा यहाँ , दिल को अकेले क्यूँ रुलाता है , कैद है जो तेरे दिल में कब से , दरिया उसे बाहर बह जाने दे। बारिश आई है , भीग जाने दे। आज खुद को तू भीग जाने दे। खाना रहना पहनना मिला है , ये सब भी कुछ कम थोड़े है , बाकी दुनिया के झूठे तौर-तरीके , ये तेरे सुकून से बढ़कर थोड़े है , और भी बहुत कुछ मिल जाएगा , पर आज मन को सुकून पाने दे। बारिश आई है , भीग जाने दे। आज खुद को तू भीग जाने दे। हर कदम सोचा समझा है तूने , न जाने कब से जीना छोड़ा है , आज का ये पल फिर हो नही , आज क्यूँ फिर बोझा ढोया है , न आज हो कल की फिक्र तुझे , आज ये पल को महक जाने दे। बारिश आई ह...

अब क्या बताऊँ मैं, कि क्या हाल हैं? लोकेश शर्मा।

अब क्या बताऊँ मैं, कि क्या हाल हैं? सुकून नहीं हैं, सुकून की तलाश हैं, दिन व्यस्त हैं, मेरी रात परेशान हैं। मिलने को बाकी तो सब मिलता हैं , यहाँ सबकी अपनी अपनी दूकान हैं। अब क्या बताऊँ मैं, कि क्या हाल हैं? बाहर से हँसता हैं, अंदर बवाल हैं, कोई पूछे तो बोलता हैं, सब कमाल हैं। हर रोज अपने आप से लड़ता हैं, ये किरदार मेरा खुद एक सवाल हैं। अब क्या बताऊँ मैं, कि क्या हाल हैं? जरुरत को रोटी कपड़ा मकान हैं, बावजूद इसके, मेरा मन अशांत हैं। सख्त चेहरा हैं और झूठी मुस्कान हैं, ये चलता फिरता तन अब बेजान हैं। अब क्या बताऊँ मैं, कि क्या हाल हैं? कल की चोट अभी गई भी नहीं हैं, कि आज फिर मेरा जंग का मैदान हैं। जिनके होने से मेरा जीवन बेहाल हैं, वो भी पूछते हैं, और कवि क्या हाल हैं? अब क्या बताऊँ मैं, कि क्या हाल हैं? ~लोकेश शर्मा।

मैं वहीं पर खड़ा तुमको मिल जाऊँगा। डा. विष्णु सक्सेना।

मैं वहीं पर खड़ा तुमको मिल जाऊँगा जिस जगह जाओगे तुम मुझे छोड़ कर। अश्क पी लूँगा और ग़म उठा लूँगा मैं सारी यादों को सो जाऊंगा ओढ़ कर ।। जब भी बारिश की बूंदें भिगोयें तुम्हें सोच लेना की मैं रो रहा हूँ कहीं। जब भी हो जाओ बेचैन ये मानना खोल कर आँख में सो रहा हूँ कहीं। टूट कर कोई केसे बिखरता यहाँ देख लेना कोई आइना तोड़ कर। मैं वहीं पर खड़ा तुमको....... रास्ते मे कोई तुमको पत्थर मिले पूछना कैसे जिन्दा रहे आज तक। वो कहेगा ज़माने ने दी ठोकरें जाने कितने ही ताने सहे आज तक। भूल पाता नहीं उम्रभर दर्द जब कोई जाता है अपनो से मुंह मोड़ कर। मैं वहीं पर खड़ा तुमको...... मैं तो जब जब नदी के किनारे गया मेरा लहरों ने तन तर बतर कर दिया। पार हो जाऊँगा पूरी उम्मीद थी उठती लहरों ने पर मन में डर भर दिया। रेत पर बेठ कर जो बनाया था घर आ गया हूँ उसे आज फिर तोड़ कर। मैं वहीं पर खड़ा तुमको....... ~ डा. विष्णु सक्सेना ।

मेरी नींदें उड़ा कर, वो चैन से सो गई। लोकेश शर्मा।

मेरी नींदें उड़ा कर , वो चैन से सो गई। सब कुछ तो किया था , न जाने कहाँ कमी रह गई। अब तो दिन-रात , सब एक-सी हो गई । रात को बारिश की बूँदें , दिन   में उनकी नमी रह गई। ~लोकेश शर्मा।