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कामयाबी सस्ती है, पर बाजार में नही बिकती। रवि भाटी।

किताबो का बोझ बचपन , जवानी खा गया , कुछ   करके दिखाना है , जल्द समझ में आ गया। जागते - जागते नींद से नाता टूट गया , बस   5   मिनट और सो लू ,  ये बहाना भी मुझसे रूठ गया। नींद अच्छी है पर आँखों में नही ढलती , कामयाबी   सस्ती है ,  पर बाजार में नही बिकती। रोज शाम मेरा दोस्त मेरे घर के बाहर आता , रवि रवि चिल्लाकर ,  जोर से Horn बजाता। मेरे   मन का लालची लड़का उसके साथ जाना चाहता , किताबो   का खौफ रह-रहकर उसे सताता। दोस्त हारा ,  खौफ जीता सब कुछ बदल गया था , कामयाबी   का मुश्किल रस्ता ,  क्या वही से शुरू हुआ था ? अब मेरे दोस्त को देखकर वो मुस्कान नही खिलती , कामयाबी   सस्ती है ,  पर बाजार में नही बिकती। मस्ती करना ,  घूमना फिरना ,  इधर-उधर की बाते , सपने थे सुहाने सारे ,  किताबे थी दिन और राते। घर की गरीबी ने लक्ष्य को और स्पष्ट दिखलाया , Crush  की आँखों से ज्यादा ,  भविष्य मुझे उझलाया। मन मसोस कर जब मैंने इन सबको पीछे छोड़ा , तब जाकर कामयाबी ने थोड़ा सा रिश्त...